नहीं मतलब, अपने माँ-बाप से बचपन से ‘शर्मा जी के बेटे’ की मिसालें सुन-सुन कर तो हर युवा कंझाया हुआ है। पर कोई शर्मा जी के बेटे के विषय में नहीं सोचता कि वो बेचारा सदा सबसे आगे रहने के दबाव के चलते किस हाहाकारी मनःस्थिति में रहता होगा। तनिक पैर फिसला नहीं कि शर्मा जी की नाक-कटाई हो जाएगी। पर फिर यही समस्या किसी और के बेटे/बेटी के सर चढ़ तांडव करेगी… किसी और की ऐसी मिसालें दी जाएंगीं। पहले पढाई का हौवा, उसके बाद नौकरी और कमाई में तुलना, फिर शादी… मने, जीवनभर दूसरों से आगे निकलने की होड़! भेड़चाल में ना जाने हम कब अपने अस्तित्व को खो देते हैं। पर ये रिक्शेवाले अंकल सबसे अलग निकले। इन्होंने तो भेड़चाल को वो दुलत्ती मारी है कि जो इनके विषय में पढता-सुनता है, हक्का-बक्का रह जाता है!

फेसबुक पर ‘ह्यूमन्स ऑफ़ बॉम्बे’ द्वारा प्रकाशित इन महोदय की कहानी सोशल मीडिया पर वायरल हो चली है। आप भी पढ़ें इनकी कहानी –

“मैं हिंदुस्तान लीवर में कार्यरत था, परंतु ९ से ५ का काम मुझे अत्यंत मशीनी लगने लगा था। कंपनी में कतई कोई खराबी नहीं थी, परंतु हर दिन की एकरसता/मोनोटॉनी से मुझे इस सीमा तक घृणा होने लगी थी कि मैं दुखी रहने लगा था। एक सवेरे मैं उठा और मैंने नौकरी छोड़ दी। मेरे पास आगे की कोई योजना नहीं थी, परन्तु मैं जानता था कि मैं कई चीज़ों में रूचि रखता हूँ, जैसे कि नए लोगों से मिलना, फोटोग्राफी और रेखाचित्रण/स्केचिंग। मैं किसी एक स्थान पर बंध कर नहीं रहना चाहता था… मैं स्वतंत्र रहना चाहता था, इसलिए मैंने कुछ माह पश्चात यह ऑटोरिक्शा खरीदी, क्योंकि मैं जानता था कि इसके द्वारा मैं हर प्रकार के लोगों से मिल पाऊंगा और अपनी सृजनशीलता/क्रिएटिविटी को प्रोत्साहित कर पाऊंगा। निश्चय ही मुझे कड़ा परिश्रम करना पड़ा — कुछ बार मैंने दिन के १२ घंटे काम किये, परंतु मैं उत्साहित था — मुझे कई नए लोगों से मिलने का अवसर मिल रहा था और मैंने मुम्बई भर के स्टूडियोज से फोटोग्राफी सीखी।

इस बात को ४० वर्ष हो गए, कुछ लोग इस काम को हेय दृष्टि से देखते हैं, परंतु मेरे लिए यह संसार का श्रेष्ठतम काम है। मैंने अपनी रुचियों को कई प्रकार से सम्मिलित कर लिया है — मैं अपनी सवारियों के छायाचित्र खींचता हूँ, मैं चित्रकारी करता हूँ और लिखता भी हूँ। अपनी फोटोग्राफी के कारण मैं संसार भर भ्रमण कर चुका हूँ — लन्दन, अफ्रीका, दुबई। और जब वे मुझसे पूछते हैं कि मैं क्या करता हूँ तो मैं गर्व से कहता हूँ कि मैं मुम्बई में ऑटोरिक्क्षा चलाता हूँ। मेरी धाराप्रवाह इंग्लिश सुनने और यह जानने के पश्चात कि मैंने एमएससी की हुई है, प्रायः लोग मुझसे मेरे ऑटोरिक्क्षा चलाने का कारण पूछते हैं, जिसपर मैं यही कहूँगा — प्रसन्नता किसी भी प्रकार के धन से नहीं खरीदी जा सकती — एक बार आप इस बात को समझ लें तो आप संसार के सबसे धनी व्यक्ति बन जाते हैं — और ठीक ऐसा ही मैं अनुभव भी करता हूँ। मैं हर दिन स्वयं को सातवें आसमान पर अनुभव करता हूँ!”

चलिए, अंकल जी की जीवनी तो पढ़ ली आपने. परंतु सचमुच नौकरी छोड़ कर रिक्शा चलने मत निकल पड़ियेगा। अंकल जी अकेले हैं… आप को विवाह भी करना है और उसके बाद दो से तीन-चार भी होना है। मल्लब, अंकल जी की कहानी से सीख ले कर अपनी रुचियों को स्वयं प्रोत्साहन अवश्य दीजिये, परंतु इतने भी प्रभावित ना हो जायेगा कि आपके परिवारजन हम टैग-टब वालों का टेंटुआ पकड़ लें!

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