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आजकल हर ओर ओलिम्पिक्स की चर्चा चल रही है। हर कोई इस चिंता में घुला जा रहा है कि हमारे देश के खिलाड़ी कोई पदक क्यों नहीं जीत पा रहे। ले दे कर इक्का-दुक्का पदक मिले हैं, और उसी में हम उछले जा रहे हैं – ठीक वैसे ही जैसे लौंडे इंजीनियरिंग की परीक्षाओं में ४० अंक पा कर भी स्वयं को धन्य मानने लगते हैं। दूसरी ओर चीन है कि ३० पदक बटोर कर भी अपने ‘खराब प्रदर्शन’ से दुखी है – ठीक वैसे ही जैसे इंजीनियरिंग की परीक्षाओं में कुछ कन्याऐं ८० अंक पा कर भी रोते दिख जाती हैं। वैसे एक बात पर हमारा पूरा राष्ट्र एकमत है – टैलेंट की कमी नहीं है, बस ठीक ढंग से प्रोत्साहन मिले! वैसे बैडमिंटन, टेनिस, मल्लयुद्ध(कुश्ती), मष्ठियुद्ध(मुक्केबाजी), तीर-कमान और बन्दूक से निशानेबाज़ी में अपना लोहा तो भारतीयों ने पहले ही मनवा लिया है… परन्तु इतर खेलों के लिए भी अपने यहाँ टैलेंट की कोई कमी नहीं है!
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अब लौंडों को ही देख लीजिये… बस प्रेयसि के मोबाइल पर इतना बोलने की देरी होती है “जानू-शोना-बाबू, जल्दी आ जाओ, घर पर कोई नहीं है”… फिर देखिये! चाहे कन्या ७वीं मंजिल पर ही क्यों ना रहती हो और खडूस चौकीदार पहरे पर ही क्यों ना हो, लौंडे ऐसा पोल वॉल्ट करेंगे कि सीधा कन्या के समक्ष खड़े दिखेंगे!

किसी भारतीय महिला को पता बस चलने दीजिये कि उसका प्रेमी/बॉयफ्रेंड या पति किसी और से नैन-मटक्का कर रहा है… फिर देखिये कैसे धोबी-पछाड़ मिलती है महोदय को!

कभी किसी को बस पकड़ने हेतु उसके पीछे दौड़ते देखा है? ऐसी स्थिति में भारतीय किसी मैराथन धावक से कम कदापि नहीं होते।

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वर्षा ऋतू में सड़क पर पड़े गड्ढों से स्वयं को बचाते हुए गड्ढों को पार करने के लिए छलांग लगाना किसी लॉन्ग-जम्प से कम नहीं होता।

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कन्याओं को छिपकली दिखते ही जिस प्रकार वे चीख कर उछल कर बिस्तर पर खड़ी हो जाती हैं, यह प्रतिभा तो किसी हाई-जम्प खिलाड़ी में ही हो सकती है।

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भाला फेंकने अथवा शार्ट-पुट जैसी प्रतियोगिताओं के लिए तो भरपूर टैलेंट कश्मीर के चप्पे-चप्पे में भरा पड़ा है ही!

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तैराकी एवं नौकायन अर्थात “पप्पू, चला ले चप्पू” अर्थात नाव चलाने में कौशल हम भारतीय हर वर्ष बाढ़ के समय दिखाते ही हैं। विश्वास ना आये तो मुम्बई वासियों और समस्त बाढ़ प्रभावित राज्यों से ही पूछ लीजिये।

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इस प्रकार, कोई शंका ही नहीं रहती कि हमारा देश टैलेंट से लबालब भरा पड़ा है, बस सही मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन का अभाव है। बाकि, इस बात का दुःख भी है कि ओलिम्पिक्स में बकैती की कोई प्रतियोगिता नहीं होती। यदि होती तो शोभा डे अवश्य स्वर्ण पदक ले आतीं। वैसे इस कला में एक से बढ़कर एक धुरंदर बकैत भारत में हैं… अब इस आलेख के लेखक को ही ले लीजिये! ?

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