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‘दही-हांड़ी’ महाराष्ट्र का अपना ढंग है श्री कृष्ण की लीलाओं को मनाने का। कृष्ण जन्माष्टमी के दूसरे दिन जवान लौंडों की टोलियाँ, जिन्हें ‘गोविंदा’ कहते हैं, ऊंची-ऊंची इमारतों पर बंधी दही हांडियां को फोड़ने निकल पड़ते हैं। हांड़ी तक पहुँचने के लिए ४ से ६ (कभी कभी इससे भी अधिक) माले का पिरामिड बनता है। उत्साह से भरा वातावरण देखते ही बनता है। हर वर्ष इस उत्सव को मैं देखने रोड पर भीड़ के संग खड़ा हो जाता हूँ।

पिछले वर्ष की बात है। मित्रों के बीच बैठे बकैती का दौर चल रहा था। कुछ लोग मदिरा गटक रहे थे, तो कुछ चकने पर हाथ साफ कर रहे थे। मैं दूसरी श्रेणी वालों के संग था – मतलब ‘चकनखोरों’ के संग। इतने में किसी ने बहती ज्ञान की गंगा में एक टंकी गंगाजल और उड़ेलते हुए कहा

“यार, ये दही-हांड़ी भी एकदम कॉर्पोरेट वर्ल्ड जैसा होता है। नहीं? ऊपर जाने वाला बाकियों के ऊपर पैर रख कर ही ऊपर चढ़ता है!”

 

मानों वोडका-धारी इस मित्र ने बाकियों के ह्रदय की भावनाओं को शब्द दे दिए हों! सब ने एक स्वर में हाँ मिलायी। वातावरण गंभीर हो चला था, एक एक कर सब अपने अपने बॉस की ‘विशेषताएं’ गिनाने लग गए। दृश्य मानों किसी गाँव की उस कुंए समान हो गया था जिसपर पानी भरने आई गांव की स्त्रियाँ अपने अपने पतियों द्वारा किये गए अत्याचार सुनाने लग जाती हैं। ऐसे में मानों एक प्रतियोगिता सी प्रारम्भ हो जाती है – ‘सबसे अधिक दुखिया कौन?’ – हर कोई बढ़ा-चढ़ा का अपने खसम की चुगली करने लग जाती हैं। भले पति स्वयं ‘जोरू का गुलाम’ ही क्यों ना हो, पर यहाँ वह आततायी रावण से कम ना बताया जाता! मैं ऐसे में ‘चुपचाप बैठ, तमाशा देख’ वाली बात का अनुसरण करता हूँ। परन्तु इस बार बात खोपड़ी की झोपडी में अटक गयी थी। क्या सचमुच दही हांड़ी कॉर्पोरेट जगत समान है?

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कॉर्पोरेट जगत का एक विशेषता उसकी ‘मॉड्यूलर’ संरचना है। माने, हर कार्य को बाँट कर इस प्रकार रखा जाता है कि एक विभाग के किसी कार्य में असफल होने पर दूसरे विभाग के कार्य पर प्रभाव ना पड़े। परन्तु यहाँ तो पूरी टोली केवल एक बड़ी इकाई समान कार्य में संलग्न होती है। किसी भी एक के ठीक से अपने कार्य को ना करने पर पूरा पिरामिड भरभरा कर नीचे ‘धड़ाम’ हो जाता है। जहाँ तक दूसरों के कंधे पर पैर रख कर ऊपर चढ़ने की बात होती है, तो यह कार्य दूसरों के सहकार्य और विश्वास से हो पाता है, उनको छल कर यह कर पाना असंभव है!

सबसे सबल लौंडे इस मानव-पिरामिड के सबसे नीची वाली श्रृंखला बनाते हैं। अब बोलीवुडिया फिल्मों की बात अलग होती है जहाँ भले ही हीरो सांड जैसा भारी भरकम क्यों ना हो, पर सबसे ऊपर वही चढ़ता है – यही अंतर है बॉलीवुड और सत्य में! जो सब से ऊपर भेजा जाता है, वह कद-काठी तथा भार में सबसे कम होता है। उसे अपने से नीचे वालों पर विश्वास होता है कि वे उसे नीचे नहीं गिराएंगे, यदि सब गिरे तो वे उसे बचा लेंगे। और अंत में हंडी को सफलतापूर्वक फोड़ने पर जो पुरस्कार की राशी होती है, वह सब में समान रूप से वितरित होती है!

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वैसे हिंदी फिल्मों में तो यह भी दिखाया जाता है कि नायक दही-हंडी को अपने सर की एक टक्कर से तोड़ देता है। सचमुच में कभी ऐसा करने का प्रयत्न मत करियेगा – दिन में तारे दिखाई दे जायेंगे। हंडिया का तो कुछ ना बिगड़ेगा, हाँ, आपके कपाल पर अंडा अवश्य उग आएगा।

घंटे भर बाद भी सब अपने अपने पतियों… अररर मेरा मतलब है बॉस के गुणगान में लगे हुए थे और मैं सोच रहा था कि काश! काश सचमुच कॉर्पोरेट जगत दही-हांड़ी फोड़ने निकले गोविंदाओं समान होता! काश !

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